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Friday, May 24, 2019

नरेश सक्सेना





नक्शे


नक्शे में जंगल हैं, पेड़ नहीं
नक्शे में नदियाँ हैं, पानी नहीं
नक्शे में पहाड़ हैं, पत्थर नहीं
नक्शे में देश है, लोग नहीं

समझ ही गए होंगे आप कि हम सब
एक नक्शे में रहते हैं !

साम्य



समुद्र के निर्जन विस्तार को देखकर
वैसा ही डर लगता है
जैसा रेगिस्तान को देखकर

समुद्र और रेगिस्तान में अजीब साम्य है

दोनो ही होते हैं विशाल
लहरों से भरे हुए

और दोनों ही
भटके हुए आदमी को मारते हैं
प्यासा।
 

Thursday, May 23, 2019

अंजू शर्मा



तीलियाँ



रहना ही होता है हमें
अनचाहे भी कुछ लोगों के साथ
जैसे माचिस की डिबिया में रहती हैं
तीलियाँ सटी हुई एक-दूसरे के साथ

प्रत्यक्षत: शांत
और गंभीर
एक-दूसरे से चुराते नज़रें पर
देखते हुए हज़ारों-हज़ार आँखों से
तलाश में बस एक रगड़ की
और बदल जाने को आतुर
एक दावानल में

नादान हैं, भूल जाते हैं कि
तीलियों का धर्म होता है सुलगाना
चूल्हा या किसी का घर
खुद कहाँ जानती हैं तीलियाँ
होती हैं स्वयं में एक सुसुप्त ज्वालामुखी
हरेक तीली

कब मिलता है अधिकार उन्हें
चुनने का अपना भविष्य
कभी कोई तीली बदलती है पवित्र अग्नि में तो
कोई बदल जाती है लेडी मेकबेथ में…


मुआवजा

कविता के बदले
मुआवज़े का अगर चलन हो तो

संभव है मैं मांग बैठूं
मधुमक्खियों से
ताज़ा शहद
कि भिगो सकूँ
कुछ शब्दों को इसमें,
ताकि विदा कर सकूँ कविताओं से
कम-से -कम थोड़ी सी तो तल्खी,

या मैं मांग सकती हूँ कुछ नए शब्द भी
जिन्हें मैं प्रयोग कर सकूँ,
अपनी कविताओं में
दुःख,
छलावे,
प्रतिकार
या प्रतिरोध के बदले,

आपके लिए यह हैरत का सबब होगा
अगर मैं मांग रख दूँ कुछ डिब्बों की
जिनमें कैद कर सकूँ उन स्त्रियों के आंसू
जो गाहे-बगाहे
सुबक उठती हैं मेरी कविताओं में
हाँ, मुझे उनकी खामोश,
घुटी चीखों वाले डिब्बे को
दफ़्न करने के लिए एक माकूल
जगह की दरकार है.

Wednesday, May 22, 2019

सुभाष नीरव

 

सुभाष नीरव


शुक्र है…



शुक्र है-
निरन्तर बढ़ रहे इस विषाक्त वातावरण में
बची हुई है, थोड़ी-सी प्राणवायु।

शुक्र है-
कागज और प्लास्टिक की संस्कृति में
बचा रखी है फूलों ने अपनी सुगन्धि
पेड़ों ने नहीं छोड़ी अपनी ज़मीन
नहीं छोड़ा अपना धर्म
स्वार्थ में डूबी इस दुनिया में।

बेईमान और भ्रष्ट लोगों की भीड़ में
शुक्र है-
बचा हुआ है थोड़ा-सा ईमान
थोड़ी-सी सच्चाई
थोड़ी-सी नेकदिली।

शुक्र और राहत की बात है
इस युध्दप्रेमी और तानाशाही समय में
बची हुई है थोड़ी-सी शांति
बचा हुआ है थोड़ा-सा प्रेम
और
अंधेरों की भयंकर साजिशों के बावजूद
प्रकाश अभी जिन्दा है।

एक बेहतर दुनिया के लिए
थोड़ी-सी बची इन अच्छी चीजों को
बचाना है हमें-तुम्हें मिलकर
भले ही हम हैं थोड़े–से लोग !


बेहतर दुनिया का सपना देखते लोग



बहुत बड़ी गिनती में हैं ऐसे लोग इस दुनिया में
जो चढ़ते सूरज को करते हैं नमस्कार
जुटाते हैं सुख-सुविधाएं और पाते हैं पुरस्कार

बहुत बड़ी गिनती में हैं ऐसे लोग
जो देख कर हवा का रुख चलते हैं
जिधर बहे पानी, उधर ही बहते हैं

बहुत अधिक गिनती में हैं ऐसे लोग
जो कष्टों-संघर्षों से कतराते हैं
करके समझौते बहुत कुछ पाते हैं

कम नहीं है ऐसे लोगों की गिनती
जो पाने को प्रवेश दरबारों में
अपनी रीढ़ तक गिरवी रख देते हैं

रीढ़हीन लोगों की इस बहुत बड़ी दुनिया में
बहुत कम गिनती में हैं ऐसे लोग जो
धारा के विरुद्ध चलते हैं
कष्टों-संघर्षों से जूझते हैं
समझौतों को नकारते हैं
अपना सूरज खुद उगाते हैं

भले ही कम हैं
पर हैं अभी भी ऐसे लोग
जो बेहतर दुनिया का सपना देखते हैं
और बचाये रखते हैं अपनी रीढ़
रीढ़हीन लोगों की भीड़ में ।



Tuesday, May 21, 2019

अलका सिन्हा


अलका सिन्हा


अंतिम सांस तक



ग्राहक को कपड़े देने से ठीक पहले तक
कोई तुरपन, कोई बटन
टांकता ही रहता है दर्ज़ी।

परीक्षक के पर्चा खींचने से ठीक पहले तक
सही-गलत, कुछ न कुछ
लिखता ही रहता है परीक्षार्थी।

अंतिम सांस टूटने तक
चूक-अचूक निशाना साधे
लड़ता ही रहता है फौजी।

कोई नहीं डालता हथियार
कोई नहीं छोड़ता आस
अंतिम सांस तक।


ज़िन्दगी की चादर



ज़िन्दगी को जिया मैंने
इतना चौकस होकर
जैसे कि नींद में भी रहती है सजग
चढ़ती उम्र की लड़की
कि कहीं उसके पैरों से
चादर न उघड़ न जाए !

अनामिका



अनामिका


चौका



मैं रोटी बेलती हूँ जैसे पृथ्वी
ज्वालामुखी बेलते हैं पहाड़
भूचाल बेलते हैं घर
सन्नाटे शब्द बेलते हैं, भाटे समुंदर।

रोज़ सुबह सूरज में
एक नया उचकुन लगाकर
एक नई धाह फेंककर
मैं रोटी बेलती हूँ जैसे पृथ्वी।
पृथ्वी जो खुद एक लोई है
कूरज के हाथों में
रख दी गई है, पूरी की पूरी ही सामने
कि लो, इसे बेलो, पकाओ
जैसे मधुमक्खियाँ अपने पंखों की छांह में
पकाती है शहद।

सारा शहर चुप है
धुल चुके हैं सारे चौकों के बर्तन
बुझ चुकी है आखिरी चूल्हे की राख भी
और मैं
अपने ही वजूद की आँच के आगे
औचक हड़बड़ी में
खुद को ही सानती
खुद को ही गूंधती हुई बार-बार
खुश हूँ कि रोटी बेलती हूँ जैसे पृथ्वी!


स्त्रियाँ


पढ़ा गया हमको
जैसे पढ़ा जाता है कागज़
बच्चों की फटी कॉपियों का
‘चनाजोर गरम’ के लिफ़ाफे के बनने से पहले

देखा गया हमको
जैसे कि कुफ्त हो उनींदे
देखी जाती है कलाई घड़ी
अलस्सुबह अलार्म बजने के बाद!

सुना गया हमको
यों ही उड़ते मन से
जैसे सुने जाते हैं फिल्मी गाने
सस्ते कैसेटों पर
ठसाठस्स ठुंसी हुई बस में!

भोगा गया हमको
बहुत दूर के रिश्तेदारों के दुख की तरह
एक दिन हमने कहा –
हम भी इसां हैं
हमें कायदे से पढ़ो एक-एक अक्षर
जैसे पढ़ा गया होगा बी ए के बाद
नौकरी का पहला विज्ञापन।

देखो तो ऐसे
जैसे कि ठिठुरते हुए देखी जाती है
बहुत दूर जलती हुई आग।

सुनो, हमें अनहद की तरह
और समझो जैसे समझी जाती है
नई-नई सीखी हुई भाषा।

इतना सुनना था कि अधर में लटकती हुई
एक अदृश्य टहनी से
टिड्डियाँ उड़ीं और रंगीन अफवाहें
चीखती हुई ‘चीं-चीं’
‘दुश्चरित्र महिलाएँ, दुश्चरित्र महिलाएँ
किन्हीं सरपरस्तों के दम पर फूली फैलीं
अगरधत्त जंगल लताएँ!
खाती-पीती, सुख से ऊबी
और बेकार बेचैन[ अवारा महिलाओं का ही
शगल हैं ये कहानियाँ और कविताएँ…
फिर, ये इन्होंने थोड़े ही लिखी हैं!’
(कनखियाँ इशारे, फिर कनखी)
बाकी कहानी बस कनखी है।

हे परम पिताओ
परम पुरुषो
बख्शो, बख्शो, अब हमें बख्शो !

Monday, May 20, 2019

भगवत रावत


भगवत रावत


लौटना


दिनभर की थकान के बाद
घरों की तरफ़ लौटते हुए लोग
भले लगते हैं…

दिनभर की उड़ान के बाद
घोंसलों की तरफ़ लौटती चिड़ियाँ
सुहानी लगती है…

लेकिन जब
धर्म की तरफ़ लौटते हैं लोग
इतिहास की तरफ़ लौटते हैं लोग
तो वे ही
धर्म और इतिहास के
हत्यारे बन जाते हैं !


किसी तरह दिखता भर रहे थोड़ा-सा आसमान



किसी तरह दिखता भरे रहे थोड़ा-सा आसमान
तो घर का छोटा-सा कमरा भी बड़ा हो जाता है
न जाने कहाँ-कहाँ से इतनी जगह निकल आती है
कि दो-चार थके-हारे और आसानी से समा जाएँ
भले ही कई बार हाथों-पैरों को उलाँघ कर निकलना पड़े
लेकिन कोई किसी से न टकराए।

जब रहता है, कमरे के भीतर थोड़ा-सा आसमान
तो कमरे का दिल आसमान हो जाता है
वहना कितना मुश्किल होती है बचा पाना
अपनी कविता भर जान।

সূচীপত্র

সম্পাদকীয় দেহ্‌লিজের চতুর্থ সংখ্যা প্রকাশ হলো অনুবাদ Agni Roy ...